एक अलग सा राजस्थानी लोकगीत

यूरोप के रोमा (जिप्सी) बंजारों के बारे में बने एक वृत्तचित्र में राजस्थान के बंजारों का गाया हुआ यह लोकगीत दो रूपों में सुनने को मिला था. शब्द के बोल कुछ-कुछ समझ में आते हैं और ऐसा लगता है जैसे कि सात भाइयों की एक अकेली बहन की किसी लोककथा का ज़िक्र हो रहा है. जब पहली बार सुना तब से ही मुझे इस गीत का अर्थ जानने की उत्सुकता रही थी. आप भी सुनिए.  अर्थ समझ न भी आये तो भी शायद सुनना अच्छा लगे. यदि आप में से किसी को समझ आये तो कृपया टिप्पणी में या ईमेल द्वारा बताने की कृपा करें. धन्यवाद!


सातों रे - खंड १


सातों रे - खंड २

रूठ के हमसे कहीं

हिन्दी फिल्मों में गायक-गायिका तो गाते ही हैं। यही काम है उनका। कभी कभी नायक-नायिका भी गा लेते हैं। नूतन से लेकर शबाना आज़मी तक, सुलक्षणा पंडित से लेकर सलमा आगा तक और श्वेत-श्याम अभिनेताओं से लेकर आमिर खान तक बहुत से अभिनेता-अभिनेत्री गाते रहे हैं।

गाने वालों की एक तीसरी श्रेणी भी है। और वह बनती है जब कि संगीतकार स्वयं ही गाते हैं। सचिन दा, हेमंत कुमार, रवि, रवीन्द्र जैन, जगजीत सिंह जैसे संगीतकारों को तो हमने खूब सुना है। आज सुनते हैं जतिन-ललित की जोडी वाले जतिन को "जो जीता वही सिकंदर" के इस कम प्रचलित गीत में। गीत के बोल हैं, "रूठ के हमसे कहीं ..."