कैम्पस - हिन्दी और मलयाली गीत एक साथ

भारत की अहिन्दी फिल्मों कई बार हिन्दी गीत सुनाई देते हैं. पिछले दिनों कई तेलुगु गीतों में हिन्दी की पंक्तिया दिखाई दीं हैं. मगर स्वतंत्र हिन्दी गीतों के लिए अहिन्दी भाषाओं में मलयालम का कोई जवाब नहीं है. मुझे अभी भी याद है कि ६-७ साल पहले हमारे एक नए बने मित्र हमें दक्षिण भारतीय समझकर चेन्नई से लाई हुई "हिज़ हाइनेस अब्दुला" की सीडी दे गए थे. उसमें येसुदास ने एक हिन्दी ग़ज़ल गाई थी.

पिछले दिनों एक अन्य मित्र के पास एक हिन्दी-मलयालम मिश्र अल्बम "कैम्पस" का आनंद उठाने का अवसर मिला. उसी का एक मधुर हिन्दी गीत आपके साथ बाँट रहा हूँ. स्वर निवेदिता का है, शब्द योगेश के और संगीत एम् जयचंद्रन का. आइये सुनें "कैसा ये जादू किया" उर्फ़ "ता-ता थय्या."

रवि के स्वर में [संगीतकार के स्वर में - ३]

१९६९ की फिल्म एक फूल दो माली अपने समय में बहुत पसंद की गयी थी. प्रसिद्ध संगीतकार रवि के निर्देशन में उसके गीत आज भी सुने जाते हैं. इस फिल्म में रवि ने एक गीत स्वयं गाया था. मुझे काफी अच्छा लगता था. आपके साथ बाँट रहा हूँ, उम्मीद है पसंद आयेगा. "किस्मत के खेल निराले" के गीतकार हैं प्रेम धवन.



वैसे जो लोग हिंदी फिल्म संगीत पटल से रवि की अनुपस्थिति से अप्रसन्न हैं उन्हें यह जानकार खुशी होगी कि हिन्दी फिल्मों के बाद रवि ने दक्षिण की कई फिल्मों में संगीत दिया है. कुछ झलकियाँ बाद में कभी इसी ब्लॉग पर आ सकती हैं.
सम्बंधित कड़ियाँ:

तीन गीत...

... और बुखार की बडबडाहट

आज का दिन उन सब बिछड़ों के नाम जिनकी मंजिल अभी दूर है. ईश्वर उनके मार्ग को निष्कंटक करे।

.... बस स्टॉप पर अकेले इंतज़ार का गुस्सा। देर से आने या बिलकुल न आने वाले फोन के इंतज़ार का गुस्सा। व्यस्त जीवन और ढेरों जिम्मेदारियों का गुस्सा. थाली में सूखकर पापड बनी रोटी का क्या? किसी को तरह तरह के पक्वान्न बनाने की लगन और किसी के लिए भोजन बस जीवित रहने की एक तरकीब। उत्तर, दक्षिण, अंतर दो विपरीत ध्रुवों का। बात बनती तो बनती भी कैसे?

नतीज़ा: नारियल के खोल सा सख्त, रूक्ष और अन्धेरा जीवन। लेकिन जैसी कहावत है - सब्र का फल मीठा. एक परी का जादू, और डांट भी - ये आप क्या कर देते हो? बच्चा को अच्छा लगेगा? पिट्टी कर दूंगी! ओSSS आपको समझ नहीं आया था! देर से ही सही, बहुत चोटें लगने के बाद ही सही, वह सख्त, रूखा और अन्धेरा खोल टूटा और धवल मिठास ने अँधेरे को धो डाला। सारी कालिमा धवल हो गयी।

मगर सब दिन एक से कहाँ रहते हैं? साल का सबसे विशेष दिन, तुम्हारा अपना दिन - कब आकर निकल भी गया, पकड़ ही नहीं सका और आज का दिन भी भागा जा रहा है। जीवन है, उसका अहसास भी है। धूप भी है पर बिलकुल सर्द। और सूरज सिर्फ रोशन, ऊष्माहीन। दिखने में कितना पास, असलियत में कितना दूर। पास है तो बस दूरी की मजबूरी। बर्फ काफी है। गर्द से ढँकी, सलेटी, कीचड सी बर्फ। निष्ठुर हवा मानो मुंह नोच रही है। नाक सूखी, आंख नम। सरदर्द, ज़ुकाम, हरारत सभी है।

उम्मीद तो अफीम है मगर यादें तो ठोस हैं। एक हाथ थामा था कभी। आज, साथ नहीं है पर उस हाथ की गर्मी अभी भी है हाथ में। आँखें बंद करके महसूस करता हूँ। यादें भी हैं, उनकी खुशबू भी है। लकीरें ज़मीन पर खिंचती है दिमाग पर नहीं। देश बँट जाते हैं दिल नहीं। शुक्र है खुदा का, ग्रह तो हमारा एक ही है। रहते होंगे अलग घर में पर "गृह" तो एक ही है।

एक गीत तुम्हारी पसंद का:


और एक मेरी:


और उस परी के लिए एक गीत रखे बिना तो बात अधूरी ही रह जायेगी: